I am a ‘work in progress’

My head’s a circus of mess

Thoughts pile up, I live in excess

I chase some clarity , but settle for guess

Yes, I am still a work in progress

Some days I sound confident, almost wise

Other days I trip over my own advice

I keep mistaking noise for being honest

Yes, I am still a work in progress

Work should be joy, but feels like slog 

Takes me to long periods of brain fog

I keep getting trapped into spiral of stress

But yes, I am a work in progress 

I build myself up with borrowed strength

Then crumble quietly at half the length

I move ahead even when it feels hopeless

Yes, I am still a work in progress

~Vaibhav Mathur

शायद मैंने कोशिश कम करी

राह ज़रा टेड़ी थी,

वो मेरी तरह अकेली थी, 

मैं चाहता तो वो मेरी थी,

शायद मैंने कोशिश कम करी ।

सारा जहाँ तो था मेरे पास,

राब्ते होश-ओ-हवास,

क्या अना की लगी थी आग,

शायद मैंने कोशिश कम करी ।

क्यों मैंने ना दिल की मानी,

किया वही जो इक बार ठानी, 

बड़ी सज़ा और छोटी नादानी,

शायद मैंने कोशिश कम करी । 

वैभव माथुर

लोग कमज़ोरी पकड़ते हैं

बेशक़ किसी के भले के लिए की हो,

लोग चोरी पकड़ते हैं,

अपनी बात यूँ सादगी से ना कहना,

लोग कमज़ोरी पकड़ते हैं।

~वैभव माथुर

Erisha तुम बड़ी हो रही हो।

तुम हमारी ज़िंदगी में परी बन के आयीं,
हँसी बनके आयीं ख़ुशी बनके आयीं,
अब हमारी साँसो की कड़ी हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

तुम ही से जगमग है ये घर,
रोशन है तुमसे मेरे ख़्यालों का सफ़र,
मेरे अंधेरों में फुलझड़ी हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

खेल कूद कर गिरकर उठकर चलना सीखा,
हमें फुसलाकर अपना उल्लू सीधा करना सीखा,
अपने पैरों पर खड़ी हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

पता ही नहीं पड़ा ये पाँच साल कब निकले,
तुम कैसी होगी बड़ी होके ये सोचके मेरा दम निकले,
क्यूँ इतनी जल्दी बड़ी हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

ये दुनिया चुनोतियों से बेशुमार है,
हो जाओ फ़ौलाद जिस्म-ओ-रूह तयियार है,
कह दो तुम सबसे तगड़ी हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

अपने सपनो को तुम्हें उड़ान देनी है,
खुल के जीयो अपनी पहचान देनी है,
कहेगा ज़माना खलबली हो रही हो,
Erisha, तुम बड़ी हो रही हो।

~वैभव माथुर

Aansu (आँसू )

Mere apne hi ghamo se bane aasu kahi dafn the,

Magar kisi dusre ke gham ka sahare liye aaj aankho se tapak gaye!

~Vaibhav Mathur

मेरे अपने ही ग़मों से बने आँसू कहीं दफ़्न थे,

मगर किसी दूसरे के ग़म का सहारा लिए आज आँखो से टपक गए।

~वैभव माथुर

जन्माष्टमी

कुछ ही देर में आएगा साँवरा,

रुझायेगा, सतायेगा, बनाएगा बाँवरा,

महेकेगी धरती चहकेगी राधा,

मिटेगी जीवन की सारी बाधा,

रचेगा रास, बुझेगी प्यास,

खेलेगा घर के कहीं आस पास,

चुपके से मैं भी देखूँ वो लीला,

वो सोहे मोरपंखी और बदन नीला,

मेरे हर अन्दाज़ में बस तेरी शक्ल हो,

सिर्फ़ तुझे सोचूँ और जीवन सफल हो।

वैभव माथुर

भाजपा या कोंग्रेस मय महागठबंधन: एक कश्मकश

भाजपा या कोंग्रेस मय महागठबंधन: एक कश्मकश

यूँ तो मोदी जी से जनता तक़रीबन ख़ुश है मगर कुल मिला के भाजपा से ख़ासी नाराज़ है। हाल ही में हुए विधान सभा चुनावों से यही निष्कर्ष निकला है , कमसकम 4 राज्यों में।

ऐसा लग रहा है मानो जनता ने GST काट के भाजपा को वोट दिए हों।

मगर गंभीरता से सोचा जाए तो ये बात तक़रीबन सच है के भारत का युवा मोदी को पसंद करता है क्यूकी उसे लगता है की मोदी लॉजिकल हैं और विकास पसंद प्रधान मंत्री हैं ।

अगर मैं अपनी ही बात करूँ तो मैं शायद 2019 के लोक सभा चुनावों में मोदी जी को वोट दूँगा भाजपा को नहीं

और पिछले कुछ महीनो में हुए और राज्यों के चुनावों के परिणामों से ओवर कॉन्फ़िडेंट होती जा रही भाजपा को एक झटका लगना ज़रूरी था।

मगर डर इस बात का है की ये झटका भाजपा को कहीं भारी ना पड़ जाए। अगर 2019 के लोकसभा चुनावों में महागठबंधन के नेता चुने जाने वाले राहुल गांधी देश के प्रधानमंत्री बन बैठे तो ये ज़ोर का झटका ज़ोर से ही लगेगा।

मुझे लगता है भारत के कई नागरिक जो अपना वोट धार्मिक राजनीति, जात-पात की राजनीति या वोट बैंक राजनीति से हटके देते हैं , शायद मेरी तरह इसी कश्मकश में हैं।

वैभव माथुर

चाहत की रोशनी

चाहत की रोशनी

होएगी एक रोज़ चाहत की रोशनी,

जब नफ़रत के अंधेरे को मोहब्बत के हल्के उजाले छुएँगें,

मेरी मंज़िल मेरे क़दमों में बिखर कर रोएगी,

जब उसे मेरे पाँव के छाले छुएँगें।

उस दिन कहलायेगी असली इंसानी फ़तह,

जब अमन के फ़लक को एकता की इमरतों के माले छुएँगें।

शायद कभी हम उनके दिल पे दस्तक दे पाएँ,

ना जाने कब चाँद को समुद्री लहरों के उबाले छुएँगें।

#वैभव माथुर

मंज़िल का पता

हर रात मंज़िल का पता सरहाने ही कहीं रखता हूँ,

कमबख़्त हर सुबह ग़ायब मिलता है ,

सोचता हूँ किसी दिन ज़रा जल्दी उठकर ,

बिस्तर से फिसलने से पहले ही पकड़ लूँगा।

वैभव माथुर।

Manzil ka Pata

Har raat manzil ka pata sirhane hi kahi rakhta hun,

Khambakht har subah gayab milta hai,

Sochta hun kisi din zara jaldi uthkar ,

use bistar se phisalne se pehle hi pakad lunga!

To Prophet Mohammad!

हाँ सुनी मैंने तेरी कहानी ऐ मोहम्मद,

हुई अब तुझसे भी मुझे मोहब्बत।

ग़रीबों का रहनुमा है तू,

अमीरों के यहाँ गुमशुदा है तू।

तेरी बोली में बस खुदा का ज़िक्र है,

सबके भले की तुझे सियासी फ़िक्र है।

अपनाता है तू हर बेबस को,

किया दूर तूने यथरिब की असमंजस को।

तेरे जैसा पेग़म्बर अब मिलता कहीं ना,

यूँही नहीं कहलाता तू सरकार-ऐ-मदीना।

बरसा दे मुझ पे नूर-ऐ-ख़ुदा-ऐ-रहमत,

हुई अब तुझ से भी मुझे मोहब्बत!

वैभव माथुर!

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To Prophet Mohammad!

Haan suni maine teri kahani ae Mohammed,

Hui ab tujhse bhi mujhe mohabbat!

Gareebo ka rehnuma hai tu,

Ameero ke yaha gumshuda hai tu,

Teri boli me bus khuda ka zikra hai,

Sab ke bhale ki tujhe siyaasi fikra hai,

Apnata hai tu har bebas ko,

Kiya door tune Yathrib ki asmanjas ko,

Tere jaisa pegambar ab milta kahi na

Yuhi nhi kehte tujhe sarkar-e-medina!

Barsa de mujh pe noor-e-khuda-e-rehmat,

Hui ab tujhse bhi mujhe mohhabat!

Vaibhav Mathur

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